मधुबनी-मैयहर परंपरा से जुड़ी प्रख्यात सितार वादक, शिक्षाविद् और गुरु डॉ. सुप्रिया शाह परंपरा, शोध और समकालीन अभिव्यक्ति के अनूठे संतुलन के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ा रही हैं।
आज के दौर में जब संगीत को सेकंड, स्ट्रीम और वायरल ट्रेंड के पैमाने पर मापा जाने लगा है, ऐसे समय में डॉ. सुप्रिया शाह संगीत की उस स्थायी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसमें राग की साधना, परंपरा का अनुशासन और सितार की अपनी विशिष्ट आवाज आज भी उतनी ही प्रभावशाली है।
अपनी पीढ़ी की विशिष्ट सितार वादकों में शुमार डॉ. सुप्रिया शाह मधुबनी-मैयहर घराने से ताल्लुक रखती हैं। उनकी संगीत साधना हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा में गहराई से रची-बसी है, लेकिन उनकी संगीत दृष्टि केवल इसी दायरे तक सीमित नहीं है। शास्त्रीय रागदारी उनके संगीत का मूल आधार है, वहीं विभिन्न संगीत विधाओं के साथ संवाद करने की उनकी क्षमता सितार को पारंपरिक शास्त्रीय संगीत के दायरे से बाहर भी श्रोताओं तक पहुंचाती है।
13 वर्ष की उम्र से शुरू हुआ संगीत का सफर
सुप्रिया शाह का संगीत से जुड़ाव महज 13 वर्ष की उम्र में स्वर्गीय पं. सतीश चंद्र के मार्गदर्शन में शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और सितार वादन की उन्नत शिक्षा स्वर्गीय पं. उमा शंकर मिश्रा से प्राप्त की। उन्हें कुछ समय तक ग्रैमी अवॉर्ड विजेता और पद्म भूषण पं. विश्व मोहन भट्ट का मार्गदर्शन भी मिला।
इसके बाद उनका सफर केवल एक कलाकार के रूप में आगे नहीं बढ़ा, बल्कि संगीत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया—एक कलाकार, शोधकर्ता, शिक्षिका और सांस्कृतिक दूत के रूप में।
वर्तमान में डॉ. शाह काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी के कला संकाय के वाद्य संगीत विभाग में वरिष्ठ संकाय सदस्य के रूप में कार्यरत हैं। वह आकाशवाणी की ग्रेडेड कलाकार भी हैं। लगभग दो दशकों से BHU में रहते हुए उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा और मार्गदर्शन दिया है। डिजिटल माध्यमों के जरिए वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विद्यार्थियों को संगीत सिखा रही हैं।
जहां कला और शोध का होता है संगम
डॉ. सुप्रिया शाह की विशेषता यह है कि उनका शैक्षणिक सफर उनकी मंचीय यात्रा के समान ही समृद्ध रहा है।
उन्होंने 20वीं सदी में वाद्य संगीत की प्रस्तुति परंपरा में आए बदलाव, विशेष रूप से हिंदुस्तानी संगीत के संदर्भ में, शोध करते हुए पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.फिल. में प्रथम स्थान हासिल किया और एम.ए. हिंदुस्तानी संगीत में गोल्ड मेडल प्राप्त किया।
संगीत को अकादमिक रूप से अपनाने से पहले उन्होंने लेडी श्री राम कॉलेज फॉर वूमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की पढ़ाई पूरी की।
संगीत साधना और अकादमिक शोध का यह अनूठा मेल उनके संगीत को एक अलग आयाम देता है। वह केवल यह नहीं समझतीं कि किसी परंपरा को किस तरह प्रस्तुत किया जाता है, बल्कि यह भी समझती हैं कि समय के साथ वह परंपरा किस तरह विकसित हुई है।
काशी से अंतरराष्ट्रीय मंच तक सितार की यात्रा
डॉ. सुप्रिया शाह के सितार की गूंज भारत के कई महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मंचों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंची है।
उन्होंने संकट मोचन अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोह के शताब्दी समारोह, संगीत नाटक अकादमी के ‘समयोग’ कार्यक्रम, नई दिल्ली, श्री बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन, RIMPA इंटरनेशनल म्यूजिक फेस्टिवल, गंगा महोत्सव, वर्ल्ड सितार फेस्टिवल सहित कई प्रतिष्ठित आयोजनों में प्रस्तुति दी है।
इसके अलावा उन्होंने मुंबई के नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स (NCPA) में भी प्रस्तुति दी है। उनकी प्रस्तुतियां कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इंडिया सहित कई प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्थानों से भी जुड़ी रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी डॉ. शाह की संगीत यात्रा उल्लेखनीय रही है। टोक्यो स्थित भारतीय दूतावास ने वर्ष 2020 में गांधी जयंती और वर्ष 2021 में भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर उनके एकल सितार वादन का आयोजन किया।
यूके स्थित Harmoniverse द्वारा आयोजित उनका डिजिटल कॉन्सर्ट ‘Anuragini’ लंदन स्थित नेहरू सेंटर और नीदरलैंड्स स्थित द गांधी सेंटर के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित किया गया।
वर्ष 2025 में उन्हें Conservatoire à Rayonnement Régional de La Réunion में सितार की मास्टरक्लास आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया गया।
सम्मानों से सजी संगीत यात्रा
डॉ. सुप्रिया शाह की संगीत यात्रा अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से भी समृद्ध रही है।
उन्हें NCPA का रवि कोप्पीकर मेमोरियल अवॉर्ड, आकाशवाणी संगीत प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार, लय ज्योति अवॉर्ड, विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडल और विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
वर्ष 2024-25 में केरल में उन्हें ‘संस्कृति अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान संगीतकार और संगीत शिक्षिका के रूप में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया।
मार्च 2025 में उनके स्कूल सेठ आनंद राम जयपुरिया स्कूल, कानपुर ने अपने गोल्डन जुबली समारोह के दौरान उन्हें अपने 50 उत्कृष्ट पूर्व विद्यार्थियों में शामिल करते हुए सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्हें एक स्मारिका कॉफी-टेबल बुक में भी स्थान दिया गया।
हालांकि, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद पुरस्कारों और सम्मानों से कहीं आगे है।
यह उपलब्धि उन विद्यार्थियों में दिखाई देती है, जिन्हें वह संगीत सिखाती हैं; उन श्रोताओं में दिखाई देती है, जिन्हें वह सितार की दुनिया से परिचित कराती हैं; और उस सेतु में दिखाई देती है, जो वह भारतीय शास्त्रीय संगीत की विरासत और बदलती हुई नई पीढ़ी के बीच लगातार बना रही हैं।
ऐसी परंपरा, जो ठहरना नहीं जानती
भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल इसलिए जीवित नहीं रहता कि परंपराओं को संरक्षित किया जाता है, बल्कि इसलिए भी कि हर पीढ़ी में ऐसे कलाकार जन्म लेते हैं, जो उन परंपराओं को नए समय के लिए फिर से प्रासंगिक बनाते हैं।
डॉ. सुप्रिया शाह इसी निरंतर परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
उनका सितार घराने की अनुशासित परंपरा को पारंपरिक संगीत मंच तक पहुंचाता है, डिजिटल माध्यमों के जरिए हजारों किलोमीटर दूर बैठे श्रोताओं से जुड़ता है, कक्षा में गंभीर अध्ययन का विषय बनता है और फिर उसी आत्मीयता के साथ राग की दुनिया में लौट आता है।
उनके लिए संगीत केवल अपनी कला और तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि शब्दों से कहीं गहरी एक ऐसी भाषा की तलाश है, जो सीधे मन तक पहुंचती है।
जैसा कि डॉ. सुप्रिया शाह स्वयं कहती हैं—
“संगीत—जहां पीड़ा आनंद का आधार बनती है और दुख खुशी में परिवर्तित हो जाता है।”
शायद यही विचार उनकी संगीत यात्रा के भावनात्मक केंद्र को सबसे बेहतर ढंग से व्यक्त करता है।
उनके सितार के तार केवल एक पुरानी परंपरा को संरक्षित नहीं करते, बल्कि आज की बदलती दुनिया को यह भी याद दिलाते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह परंपरा आज भी क्यों उतनी ही महत्वपूर्ण है।